28 मार्च 2008

क्या चाहिए इंसान को?


क्या चाहिए इंसान को?
जीने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान|
क्या चाहिए इंसान को?
दो वक्त की रोटी
या चाहिए
बर्गर, पिज्जा और सेंड-विच|
क्या चाहिए इंसान को?
तन ढकने को कपड़े
या चाहिए
पीटर-इंग्लेंड और पेंटा-लून|
क्या चाहिए इंसान को?
सर पर एक छत
या चाहिए
सोने की सलाखों से बना महल|
क्या चाहिए इंसान को?
सोना-चांदी,
हीरा-मोती,
पाँच सितारा होटल,
रूपैये-पैसों का ढ़ेर,
या अपने सपनों का महल?
क्या चाहिए इंसान को?
खुली हवा,
चैन की साँस,
मन की शांति,
और दाल-रोटी|
क्या चाहिए इंसान को?
मृग-त्रिसना,
छलावा,
झूठा अहम् ,
या चाहिए
वास्तविकता,
आत्म्स्वाभिमान,
और सच्चाई|
ये सच
जो बदल न सके कोई
आए है जगत मे
जाना भी है यहाँ से
ना कुछ ले कर आए हैं
ना कुछ लेकर जायेंगे
फिर इसे क्यों झूठ्लाये हैं?
पूछ अपने मन से ....
क्या चाहिए इंसान को .....
पाँच तत्व से बना यह शरीर
होगा एक दिन विलीन
फिर क्यों ना समझे?
क्या चाहिए इंसान को...?

27 मार्च 2008

बदरा


घटायें छाये घनघोर
चले हैं किस ओर?
कहते है, कारे-कारे बदरा
बरसेंगे आज, तुम्हारे अंगना
पंछी उड़-उड़ कर
लौट रहे है, अपने घर
ताके नयन राह तुम्हारी
बेचैनी सी लागे, घड़ी-घड़ी
चपला जब चमके बादल मे
तन थर्राये, मन ये कापे
सुन्दूरी नही, आज गोधुली
रह रह कर, चमके बिजुरी
दिन का उजाला हुआ कम
चढ़ने लगा, अब श्याम रंग
गिरने लगी बूंदे टिप-टिप
आँगन को भिगोती रिमझिम
मन मे कभी, उठे हजार लहरें
कभी कदमों की आहट सुनें
डरा जाए, बदरा ये कारे-कारे
लौट के आ जाओ तुम, उससे पहले|



24 मार्च 2008

प्रार्थना


हे प्रभु! तुम्हारे चरणों मे मेरी यही प्रार्थना हो .....
हर दुःख से बड़ी मेरी हिम्मत हो
हर डर से बड़ा मेरा साहस
हर इक्च्छा से बड़ा मेरा धैर्य
हर दर्द से बड़ी मेरी शक्ति
हर खुशी से बड़ी मेरी प्रार्थना
हर गर्व से बड़ी मेरी नम्रता
हर दिन से बड़ा मेरा एक पल हो
हर मौत से बड़ी मेरी जिंदगी
हर रात से बड़ी मेरी सुबह हो
हर अंधेरे से बड़ी मेरी ज्योति
हर राह से बड़े मेरे कदम हो
हर बाधा से बड़ी मेरी मंजिल|

22 मार्च 2008

होली को मन तरसे


बचपन के आँगन में,
खेली थी, जो 'होली' हमने
आज उस होली को मन तरसे|
चारो तरफ़ उमंग
रंगों का उफान हर दिशा में बरसे
लाल-पीले हर रंग के रंग
मुख हमारे हरे-नीले
हाथों मे मुट्ठी भर-भर गुलाल
गालों पर सभी रंगों का कमाल
घर-घर जा कर मचाते धमाल
आज उस धमाल को मन तरसे
आज उस होली को मन तरसे
पकवान जो, होली में विशेष बनते
पुआ-पुरी और कचौरी
दही-भल्ले संग खूब ललचाती जिलेबी
पिचकारियाँ भर-भर देते एक-दुसरे पर मार
करते सब मिल रंगों की बौछार
उस बौछार मे, गुलाब जामुन पर चढ़ते रंग हजार
फागुन की फुहार में हम मस्त-मौला हो कर झुमते
आज उस फुहार को मन तरसे
आज उस होली को मन तरसे|

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/03/33-2-1.html

20 मार्च 2008

आओ मिलकर खेलें होली


आओ, मिलकर खेलें होली
उमंग, तरंग के संग
राग, रंग और प्यार की होली
पिचकारियों से निकलती,
सर-सर-सर, बहार की रंगोली
आओ, मिलकर खेलें होली|

फागुन से सराबोर होकर,
रंगों से तैयार होकर
घूमें आज, टोली-टोली
कभी नीली, कभी पीली
भर कर अपने रंगों की झोली
आओ, मिलकर खेलें होली|

मन झूमें, तन झूमें
मिलाकर, अपनी ताल से ताल
'फगुआ' मे करें सब धमाल
उडाते चलें, हर रंग के गुलाल
हाथों मे लेकर झाल और ढोलकी
आओ, मिलकर खेलें होली|

आये, बरस मे एक ही बार
भुला दे सब, चाहे हो गम हजार
गले मिलें सब, खुशी का है अवसर
मिलकर करें सब, 'फागुन' का स्वागत
लो आ गयी, रंगों की डोली
आओ, मिलकर खेलें होली|

18 मार्च 2008

देश-परदेश



एक सफर मे उससे मुलाकात हुयी
वो था, एक टैक्सी ड्राईवर
हम थे राही
बातें हुयी, कुछ विषयों पर
आदान-प्रदान हुआ कुछ विचारों का
हम थे परदेश मे, देश की बातें होने लगी
उसकी आंखें कहीं गुम हो गयी
क्या जाने क्या? कुछ खोजने लगी
पूछा हमने जाते हो देश को?
उसने मायूसी से कहा .....
याद तो बहुत आती है मिट्टी की
लेकिन जाए तो किस से मिलने जाए?
देश से निकले बीस बरस बीत गए
अब कोई नही अपना, वहाँ देश मे
क्या करें हम? अब हालात हैं ऐसे
हम ना रहे यहाँ के, ना रहे वहाँ के
यहाँ वो अपनापन नहीं मिलता
यहाँ अपनों की बातें नहीं होती
परदेश मे रहना, मज़बूरी है हमारी
आख़िर रोटी भी तो है जरूरी ...
अब पैसे तो बहुत कमा लिए हमनें
इस दौड़ मे, देश छुट गया पीछे
यहाँ परदेश मे, हम रह गए अकेले
आज देश की बहुत याद आती है
पर यही सोचते है....
हम जाए तो कहाँ जाए?
बातें उसकी गुजती हैं मन मे
मायूसी उसकी, आंखों मे तैरती है
तड़प उसकी, बार-बार हमें झकोरती है
क्यों है यहाँ हम? सब छोड़ कर परदेश मे
वहाँ क्या नही मिलता? अपने देश मे ......






14 मार्च 2008

बचपन


छप-छप पानी
छप-छप पानी
पानी मे करते, हम नादानी
छप-छप पानी
छप-छप पानी
पानी मे बहती, कागज़ की कश्ती
रिमझिम बारिश
रिमझिम बारिश
बारिश मे करते, हम शैतानी
रिमझिम बारिश
रिमझिम बारिश
बारिश मे भींगते, लेकर छतरी
टीम-टीम तारे
टीम-टीम तारे
तारों के संग, सोते जागते
टीम-टीम तारे
टीम-टीम तारे
तारों के संग होती सौ-सौ बातें
चन्दा मामा
चन्दा मामा
कहते, वहाँ रहती है नानी की परियां
चन्दा मामा
चन्दा मामा
माँ कहती, खालो उनके नाम का एक निवाला
लुकछिप खेलें
लुकछिप खेलें
आंखें बंद कर, सबको देखे
लुकछिप खेलें
लुकछिप खेलें
गिनती गिन-गिन, हम सब भागे
वो पलछिन
वो पलछिन
गुजरे हुए पल, गुजर गए वो दिन
वो पलछिन
वो पलछिन
बिसार दी सब बातें, लेकिन भुला ना पाए बचपन

12 मार्च 2008

आत्मा की सुने


आँसुओ की,
तेरी दुनिया मे कोई कीमत नहीं|
तेरी दुनिया मे रोने की भी,
शिकायत होती है|
गम छुपाना,
बड़ा मुश्किल है, काम
आंखों मे जब नमी भर जाती हैं,
तेरी दुनिया मे लोग कहते हैं,
हँसी मे, आंखें हैं छलक गई|
दुखों के साथ रहना,
अपनी-अपनी मुश्किलों के साथ जीना,
घुटन मे दम अपना घोटते रहना,
तेरी दुनिया मे वाहवाही के लायक,
यह बात है, समझी जाती|
रोते है जो,
दुखों पर उसके लोग हँसते हैं|
लोग वही जो इन्ही दुखों को छुपा कर जीते हैं
तेरी दुनिया मे बाहरी चीख पुकार सुनी और सुनायी जाती है|
भले आत्मा रह जाये, धिक्कारती|
आत्मा की सुने,
या सुने तेरी दुनिया के लोगों की?
अपनी दुखों के साथ हँसते हुए जिए,
या आँसुओ को छुपा कर, खुश होने का भ्रम रखे?
भ्रम यह की, हम है सबसे सुखी
भ्रम यह की, हमें कोई भी दुःख नहीं
शायद तेरी दुनिया के लोगों को पता नहीं,
आत्मा जो है, कहती
सच्चाई वही है, होती
सुख और दुःख को मिलाकर ही
जिंदगी सच के पैमाने पर खरी है उत्तरती|

11 मार्च 2008

फागुन


मस्त हवा जब चली,
बादल घिर-घिर आए, कोयल बोली
डाली-डाली फिर से झूमी,
आम के बौर से, डालियाँ झुकी-झुकी
उड़ते पखेरू, पंख फैलाये
गगन को चूमते, अपना आसमान बनाए
जगत का रंग भया सिंदूरी,
धरती ने दुल्हनवाली चादर ओढ़ी,
छुपते छुपाते कुछ शरमाते,
जैसे कोई गोपी, घूँघट खोले
बिल्कुल सुहावना ये नव-रूप,
मधुरिमा इसकी, प्रकृति की हर लय मे
जैसे दूर बजतें हो ढोल और मृदंग,
संग-संग उड़ते, गुलाल रंग-रंग के
सब रंग ये, धरती पर आ बिखरे
सुगन्धित हुआ अबकि, फ़ागुन
देख-देख जिसे, नयन लेते सुख|

दम भर को ....


थोड़ी देर जो तुम ठहरो,
हम भी तुम्हारे साथ चलें|
बेरुखी से तुम ये ना कहना,
दम भर को फुर्सत नहीं|
तन्हाई मे जो तुम जीते हो,
महफ़िल मे भी, तन्हा रहते हो
जो थाम लो, हाथ मेरा
तो हम भी बन जाए तुम्हारे साथी|
तीखे नज़रों से अपने ये ना कहना,
दम भर को हमें फुर्सत नहीं|
कई बार तुम्हें देखा है, अकेले-अकेले
कई बार तुम्हें देखा है, परछाई से बतियाते
सच है, तन्हा रह गए हो तुम भी
जिन्गदी का सफर अभी बहुत है, बाकी
देखो फिर से मुझे तुम ना झूठलाना,
की दम भर को फुर्सत नहीं|

05 मार्च 2008

आज की ताज़ा ख़बर


चाय की चुस्की लेते हुए,
आज का अखबार पढने बैठे|
नजर गई, आज की ताज़ा ख़बर पर
पत्नी पीड़ित पति ने कोर्ट की ली शरण|
बेटे ने बाप को, पैसों के लिए धमकाया|
सोचा ....भाई ये क्या जमाना आ गया?

नजर आगे, और खबरों पर गई
राजनीति मे नेताओं की राजनीति से
मन खिन्न हुआ, चाय फीकी लगी
हमने एक प्याला और बनाया|
पढ़ते हैं, कहीं स्कूल बस खड्डे मे जा गिरी
कहीं रेल-पटरियों को आतंकवादियों ने उडाया|
सरकार ने घायलों को मुवाबजे का ऐलान किया|
तभी एक दूसरी ख़बर ने मुझे चौकाया
मृत सैनिकों के परिवार जनों ने, रोष है जताया
कारण ..वर्षों से ना मिली घोषित सरकारी सहायता
उफ़! ....ये क्या जमाना आ गया?

चुस्कियों संग नजर खबरें देखती गयी|
हर ख़बर से मन विचलित होता गया|
कहीं चोरी, कहीं मर्डर, कहीं डाका
कहीं बंदूकें, कहीं अपहरण, कहीं गोलियाँ|
क्या-क्या चल रहा है मेरे देश मे?
कभी जो हुआ करती थी सोने की चिडियाँ,
किसान कर रहे हैं, वहाँ आत्महत्या|
सरकारी कुर्सियों पर बैठे नेताओं की,
बढ़ रही है, तन्खावाह|
वहाँ गरीबी से तंग, बाप ने बेटी को बेच डाला|
ओह!...ये क्या जमाना आ गया?

कैसी-कैसी ये खबरें, हर ख़बर
चाय का मसाला बन कर है रह जाती|
चाय की चुस्की संग प्रत्येक नागरिक इसे पढता है,
चाय की प्याली के खत्म होते ही,
ये खबरें भी बंद हो जाती हैं|
अखबार को बंद कर, उलट कर रख दिया जाता है|
'आज की ताज़ा खबरें' अखबार मे कहीं दफन हो जाती हैं|
अरे, सरकार की तरह मेरी चाय भी ठंठी हो गई
सरकार, जो सिर्फ़ कुछ वादों पर बनती और टूटती है
सब वादें 'गरमा-गरम ख़बर' बन जाती है|
मैंने भी एक और प्याले का जी बनाया|
और वही मैंने भी सोचा, जो हर कोई है सोचता|
गंभीर है समस्या....क्या होगा इस ज़माने का?

04 मार्च 2008

चल-चल रे बादल चल


चल-चल रे बादल चल
हवा के संग उड़ कर,
किस देश तू है पँहुचा?
पूछते है सब तुझसे यँहा?
बता क्या है? तेरा परिचय
किस जमीन के टुकड़े पर तू बरसेगा?

चल-चल रे बादल चल
सोच मे तू, उलझा क्यों रहेगा?
इस टुकड़े पर कब तक झुका रहेगा?
इस जमीन की सीमा को भी लाँघ जा,
बता क्या है? तेरी मनसा
किसे खुश, किसे नाराज करेगा?

चल-चल रे बादल चल
हवा के संग उड़ जा कही और
ठूंठ अपना, कंही दूसरा ठिकाना
जिस जमीन का कोई हिस्सा ना हो,
जंहा कोई न पूछे तुझसे तेरा परिचय,
बुलाये तुझे प्यार से, वँहा जाकर बरस जा

चल-चल रे बादल चल
जिस नगरी हो तेरा इन्तजार,
आँखे घड़ी-घड़ी देखे तेरा रास्ता
जंहा तेरा ना हो, कोई बन्धन
बांधे ना कोई तुझे, सीमाओं संग
उस माटी पर रस बरसा

चल-चल रे बादल चल

27 फ़रवरी 2008

जीवन-धारा


नदी के धारों, बीच
हिडोलें लेता, अकेला नांव
बहता रहता, धारा संग
चलता रहता, किनारों संग
मंजिल उसकी, माझी के हाथ
उन लहरों का क्या?
लौट जाए जो किनारों तक आ-आ|
उसका कौन किनारा?
पतवार काटे, नदी के धार
नैया को मिले, पानी बीच राह
हवा से जूझती, उसकी रफ़्तार
सफर मे पतवार ही है, एक मात्र हथियार
पतवार का सहारा, बस माझी के हाथ
उन लहरों का क्या ?
जो नदी बीच उठ-उठ समाये|
उसका कौन सहारा?
नैया ना छोड़े लहरों से लड़ना,
लहरें न छोड़े नदी का साथ
किनारों को काट नदी आगे बढ़ती रहती|

'जीवन-धारा', नदी की धार जैसे
सफर मे माझी ये 'तन',
धुन्धता रहता अपना किनारा|
जब उठे तूफ़ान के आसार,
जीवन की थर-थर कापे 'पतवार',
साँसों की गति, थम-थम जाए|
इस माझी तन का क्या?
इसकी कौन सी मंजिल?
भटकता रहता जीवन सफर मे,
मृगतृष्णा जैसा, यह माया संसार|
जूझता रहता, अपनी ही परछाइयों से|
क्यों जाए भूल माझी?
माटी की यह काया,
माटी मे मिल जाना है|
क्यों फिर जाए तूफ़ान से डर?
लाखों लहरें उठाये,
मन के बीच उथल-पुथल,
हार नही मानना,
यही माझी की मंजिल|
पत्थर को काट ज्यों नदिया आगे बढे
किसी बिजली की गति लिए,
मान तू भी, यही तेरा 'लक्छ्य'
आगे बढ़ाना ही, तेरी जीवन-धारा|


20 फ़रवरी 2008

गरीब माँ का बेटा


कभी वह, माँ का आँचल खिचता
कभी बार-बार उससे, मिन्नतें करता
अम्मा ले दो, मुझे वो खिलौना
दिला दो मुझे वो तोता-मैना|
माँ उसकी, कभी उसे मनाती
कभी उसके मुख को, चूमती-पुचकारती|
कभी वह माँ का ध्यान हटाता,
कभी उसे इशारों में बताता|
माँ मेरी, मुझे भी दे दो चना वो मसाले वाला
मेरे लिए ले लो, खाने को कुछ भी थोड़ा सा|
माँ कभी उसे, ना कह कर समझाती
कभी अपने बेटे का, ध्यान भट्काती
कभी वह, चुपचाप सब निहारता
कभी माँ की गोद मे, सर छुपा कर रोता|
माँ देखो, वो जा रहा है गुब्बारे वाला
अब की उसे ना रोका तो, वो ना आएगा दुबारा|
माँ कभी उसे चूमने लगती,
कभी बेचैन हो कर, उसकी सिसकियाँ सुनती
गरीब माँ का बेटा है तो क्या ?
माँ उसकी तंग हाल है तो क्या हुआ ?
उसका भी दिल मचलता है
जी उसका भी सब देखकर ललचाता है|
माँ उसकी सोचती कैसे बेटे का दिल बहलाऊ?
कैसे ला कर वो सब दूँ, जो इसने चाहा?
कभी मुट्ठी मे बंद चंद सिक्को को देखती
कभी रोते हुए बेटे को देख, ख़ुद पर रोती
कर दे खर्च इसे अगर, अपने गरीब बेटे पर
फिर कैसे जलेगा चूल्हा, आज इस गरीब के घर
ममता उसकी तिल-तिल मरती है,
सिसकियाँ भी दम घोटने लगती हैं|
कभी बेटे को, अपने आँचल मे छुपाती है
कभी प्यार से, उसके सर को सहलाती है
माँ की आंखों के लहू बेटे से कहते है
बेटा... तू मत मांग कुछ भी इस लाचार माँ से
क्योंकि .....
तेरी माँ गरीब है
तू एक गरीब माँ का बेटा है|



18 फ़रवरी 2008

रिक्शावाला का स्वाभिमान

एक दिन जब मन मे कुछ उथल -पुथल हो रही थी , तब जाने क्यों कोई भी विचार कलम से निकल कर सफ़ेद पन्नों पर कविता का रूप नही ले पा रहे थे | तब मैंने सोचा आज आपको अपने जीवन की एक सच्ची घटना ही क्यों न बता दूँ , लिख कर ही सही .......एक लेख के रूप मे , जो शायद किसी किसी को एक कहानी लग सकती है | लेकिन यह कहानी भी एक सच है , आज भी वह घटना मुझे याद है |

बात नवरात्रि की है ...... जब मैं अपनी बहनों और कुछ सहेलियों के साथ दुर्गा-पूजा मेला घूम रही थी हम लोगों के साथ एक छोटी बच्ची भी थी |घूमते-घूमते सूरज कब सिर पर चढ़ गया ,हम लोगों को पता ही न चला |हद तो तब हो गई जब बच्ची सोने लगी , अब उसे गोद मे उठा कर घूमना हमलोगों के बस की बात नही थी | हमने बिना सोचे समझे एक रिक्शावाला को बुला लिया और हमारे बीच यह तय हुआ की ,कोई एक उस बच्ची के साथ रिक्शा में बैठ कर घर चला जाए बाकी सदस्य मेले की मौज जारी रखेंगे |रिक्शा वाला चुप- चाप खड़े हमारी बहस सुन रहा था , देखने में वो उम्रदराज लग रहा था , सर पर धूप से बचने के लिए पगड़ी बांधे हुए , मोटा चाश्म्मा उसके धुंधली होती आंखों का सहारा बने हुए थे |मिला जुला कर वो एक सीधा-साधा अच्छा इंसान लग रहा था ,जो शायद बुरे समय के फेर मे पड़ गया था | ये तो हुयी रिक्शावाला की बात |इस बीच हमारी टोली किसी फैसले पर न पहुँच सकी और हमने सोचा इससे अच्छा है की इस रिक्शावाला को लौटा दिया जाए और हम सब थोड़ा और घूम कर एक साथ घर को जाएँ | रिक्शावाला को लौटा दिया गया , वो मायूस हो कर वापस मुड़ा लेकिन उसने एक भी शिकायत नहीं किया ,जैसे की आप लोगो ने मेरा वक्त बरबाद किया , जब नही जाना था तो क्यों बुलाया था वैगरा-वैगरा... जो आमतौर पर कोई भी रिक्शावाला कह जाता | तभी किसी को इस बात की याद आई की ,नवरात्रि के दिन किसी को खाली हाँथ वापस नही करना चाहिए | इसीलिए हमलोगों ने उसे बक्शीश देनी चाही लेकिन, उसने उस लेने से इनकार करते हुए जो बात कही ...वो आज भी मेरे दिल मे गूंजता रहता है उसी के शब्दों में ...."मैं ये नही ले सकता , जब मैंने आपका कोई काम ही नही किया तो ये क्यों लूँ , गरीब हूँ लेकिन मेहनत की ही कमाई खाता हूँ " | उसके शब्दों से हम सभी अवाक् रह गए |बिना कुछ पूछे हममे से एक उस के रिक्शे पर बैठ कर घर की ओर चल दिया , और हम सब भी घर की तरफ़ मुड़ चले रिक्शे के पीछे-पीछे | मैं रास्ते भर ये सोचती रही की कितनी बड़ी बात हमें आजएक रिक्शा वाला कह गया ?आज भी रिक्शावाला मुझे याद है ,उसकी सूरत भी मुझे याद है |इस बात को कई साल हो चुके है , लेकिन उसकी गरीबी और उसके स्वाभिमान ने हमें जो पाठ पढ़ाया मेरे लिए जिंदगी
भर का सबक हो गया |

15 फ़रवरी 2008

दुनिया बनाने वाले


एक गीत सुना था बचपन मे ,
"दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन मे समायी
तुने काहें को दुनिया बनायी"
बोल कुछ अजीब से लगते थे |
सोचती थी ,ये भी कोई गीत है ?
मेरी दुनिया तो ,कितनी निराली है
जिसमे माँ-बाबूजी हैं
भईया ,दीदी हैं
दोस्त हैं ,और मेरी गुड़िया है
गुड़िया भी मुझसे बातें करती थी |
इसी दुनिया मे मैं खुश रहती थी |
बचपन छोड़ जब आगे बढ़े ,
तब भी उस गीत के बोल कानों मे पड़े ,
संग-संग मैं भी कुछ गुनगुनाने लगी |
जिंदगी की हर मोड़ पर ,
गीत के बोल यथार्थ लगने लगे |
इस भरी दुनिया में
इंसान भी बातें करता न था |
मतलब के सब दोस्त साथी बने ,
जरुरत के लिए हर बन्धन बना |
आज भी उस गीत के बोल हम गुनगुनाते है ,
हर बोल के साथ सोचते है ......
कितने सही है ये शब्द ,
कितनी सच्चाई है ,इसके अर्थ में
"दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन मे समायी
तुने काहें को दुनिया बनायी"

कल फिर सुबह होगी ...



कल फिर सुबह होगी ...
और तुम ,
चल दोगे अपना हाथ छुड़ा कर
मेरे हाथों से .....................
कल फिर सुबह होगी ...
मैं फिर ,
रोकूंगी तुम्हें ,तुम न मानोगे
चल दोगे
मुझे
रुला कर
आंखों को मेरी , नम कर .............

14 फ़रवरी 2008

मेरी खिड़की से शहर

सुबह-सुबह जब खिड़की खुली
देखती हूँ ,सुबह तो कब से हो चुकी
रास्तों पर भाग रहीं हैं मोटरें ,कारें
बजा-बजा कर हार्न ,
लोगों को करते हुये दर किनार |
बच्चे खड़े हैं ,कतारों मे
करते हुए स्कूल बस का इन्तजार |
कुछ लोग भी दौड़ रहे फूट्पाथ पर
तेज-तेज कदमों से ,आगे बढ़ते हुये
जल्दबाजी मे पार्किंग से निकालते हुए कार
साहब लोग हैं , ऑफिस जाने को तैयार |
बिल्डिंग का रुका हुआ काम भी चल पड़ा
कभी लिफ्ट ,कभी क्रेन आगे बढ़ रहा |
बसें चल रही हैं ,अपनी स्टोपेग की ओर
ट्रेनें दौड़ रहीं हैं ,अपनी मंजिल की तरफ़
सभी यात्री टक-टकी लगाये बैठे हैं ,
कोई खुश ,कोई उदास ,कोई शांत है
शहर के साथ सबकी जिंदगी भाग रही
भागते हुए लोग ,दौड़ता हुआ समय
बेहाल सभी जन ,
सब कुछ मुट्ठी मे बंद करने को व्याकुल मन
साँस लेने की भी जंहा ,पल भर फुरसत नहीं
यह सुबह कैसी ?
शहर की सुबह यह .......लेकिन सुबह ऐसी !

13 फ़रवरी 2008

वाह रे लेपटोप


लेपटोप क्या बना !
दुनिया को नया रूप मिला |
जब से लेपटोप स्टेटस सिम्बोल बना
घरवालों ने एक नहीं , दो- चार खरीदा |
एक चुन्नी का ,एक मुन्नी का
एक श्रीमती का , एक श्रीमान का |
अब सबकी ख़ास जरुरत है लेपटोप
बिना इसके कुछ भी न होता फटाफट |
श्रीमान इसे ऑफिस मे चलाते हैं ,
श्रीमती इसे घर मे चलाती हैं |
अपने बच्चो का दिल बहलाती हैं ,
इंटरनेट क्या जुड़ा इससे ,
यही टीवी बना ,यही फ़ोन बना
श्रीमान के जाते ही , श्रीमती ऑनलाइन हो जाती हैं
अपनी सखियों-सहेलियों से जी भर बतियाती हैं |
श्रीमान जब भी घर आते हैं ,
लेपटोप के साथ कुछ ई-मेल भी लाते हैं |
श्रीमती जब श्रीमान से रूठती हैं ,
तब भी फ्री टीवी .कॉम पर सास-बहु सीरियल देख डालती हैं |
बच्चे कार्टून के लिए ,
इसे तबला बना देते हैं |
ऑनलाइन कुछ दोस्त बार-बार पिंग करते होते हैं |
जब ऑफिस के कामो से श्रीमान जी थक जाते हैं ,
श्रीमती जी तब भी उन्हें याद ना आती है ,
जी बहलाने को याहू मेस्संजर के दोस्तों से चेत्तिंग कर लेते हैं |
श्रीमती जी किसी और लेपटोप पर फ़िल्म डाउन लोड करती होती हैं |
वाह रे वाह !
सुबह इसी से और शाम इसी से होती है ,
सारी दुनिया इसमे उलझी रहती है ,
ऊपर वाले की बड़ी दुनिया गूगल.कॉम मे सिमट गई ,
जब ख़ुद थक जाते है ,
घरवाले , सो जाते हैं
लेकिन
लेपटोप को तब भी आराम न होता है ,
उस वक्त भी वो स्टैंड बाय मोड मे रहता है |

12 फ़रवरी 2008

खिचड़ी पक रही है .......


शहर कि एक दोपहरी ऐसी ................

महिलाओं की गोष्ठी में ,
जाने क्या खिचड़ी पक रही थी |
खिड़की से अन्दर आती धूप ,
सर्दी मे ऐसा सुहाना रूप
व्यस्त हैं , सभी जन
कोई ऑफिस , कोई ट्रेन , तो कोई ई-मेल
लड़की के हाथ में गाड़ी कि चाबी ,
कान पर उसके मोबाइल लटक रही थी ,
सबसे जुदा , महिलाओं कि सम्मेलनी
कोई सास कि , तो कोई बहु की ओम्लेट बना रही थी |
लड़का अपने चार यार दोस्तों के साथ ,
सिगरेट के छ्लों में ,धुआं उड़ाते हाँथो में हाथ
बच्चा भरी दोपहरी में ,खेल रहा सड़क पर
होम-वर्क के लोड से निगाह चुरा कर ,
लेकिन ,महिलाओं कि किट्टी-पार्टी अभी भी जारी है |
कोई सुन रही है , तो कोई सुना रही है ....................
कोई स्वेटर कि सलाईन्या चला रही है ,
और ,कोई खिचड़ी पका रही है ..................