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15 जुलाई 2008

अगर ऐसा भी होता.....तो....कैसा होता.....


अगर ऐसा भी होता तो ...
कैसा होता...

बादल की डालियों पर
हवा के पालने पर ...
झूल पाते हम...तो
कैसा होता....
सूरज की किरणों को थाम
पहुँच पाते आकाश तक
छू लेते बस जरा सा...तो
कैसा होता....

अगर ऐसा भी होता तो ...
कैसा होता ....

इन्द्रधनुष के सातों रंग
उनसे भर कर अपनी कलम
बना पाते कोई चित्रपट ....तो
कैसा होता....
टिमटिमाते तारों से
लेकर उनकी रौशनी
जगमगा पाते राह अपनी ...तो
कैसा होता......

अगर ऐसा भी होता ...तो
कैसा होता.....

चँद्रमा की प्रतिबिम्ब से
भर कर अपनी अंजुली
जल उठते सारे दीये ....तो
कैसा होता.....
भोर की लालिमा संग
पंछियों के गुंजन, हर छन
बजाते मृदंग और सितार ...तो
कैसा होता......

ख्वाव तो कई है, आंखों मे
अगर सच बन जाते सभी .... तो
कैसा होता.....
अगर ऐसा भी होता ...तो
कैसा होता ......

19 जून 2008

दिलों की मजिल


मंजिल है...दिल तक पहुँचने की
इस राह मे,
ना जाने कितनी
हसरतें जागती है|
बिन पूछे मुझसे
मुझी को सताती हैं|
न कभी देखा,
ना कभी जाना जिसे,
ना ही महसूस किया कभी,
कहाँ से आकर जाने ?
दिल मे मेरे,
सुबह शाम मुझे जगाती है|
इस राह मे,
सुंदर सपनों की दुनिया है|
बादलों का छत,
और फूलों की जमीन है|
कभी इस पर भी,
काँटों का साथ मिलता है|
दिल रोता है... तब
जब, सपना कोई टूटता है
लेकिन मायूसी...ना
कभी भी इसकी हमसफ़र नही|
हिम्मत रहे बाकी
दिलों की मजिल अब दूर नही|

04 मार्च 2008

चल-चल रे बादल चल


चल-चल रे बादल चल
हवा के संग उड़ कर,
किस देश तू है पँहुचा?
पूछते है सब तुझसे यँहा?
बता क्या है? तेरा परिचय
किस जमीन के टुकड़े पर तू बरसेगा?

चल-चल रे बादल चल
सोच मे तू, उलझा क्यों रहेगा?
इस टुकड़े पर कब तक झुका रहेगा?
इस जमीन की सीमा को भी लाँघ जा,
बता क्या है? तेरी मनसा
किसे खुश, किसे नाराज करेगा?

चल-चल रे बादल चल
हवा के संग उड़ जा कही और
ठूंठ अपना, कंही दूसरा ठिकाना
जिस जमीन का कोई हिस्सा ना हो,
जंहा कोई न पूछे तुझसे तेरा परिचय,
बुलाये तुझे प्यार से, वँहा जाकर बरस जा

चल-चल रे बादल चल
जिस नगरी हो तेरा इन्तजार,
आँखे घड़ी-घड़ी देखे तेरा रास्ता
जंहा तेरा ना हो, कोई बन्धन
बांधे ना कोई तुझे, सीमाओं संग
उस माटी पर रस बरसा

चल-चल रे बादल चल