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24 जून 2008

मेरी माँ


मेरी माँ
तुम्हे कभी मै, भूलती नही माँ
जब याद करती हूँ तुम्हे,
जान जाती हो तुम कैसे?
उदास हूँ मै, माँ..
आ जाती हो कहीं से,
मेरी ही खाबों-ख्यालों मे
और कहती हो..तेरे साथ मै हूँ ना|
जब कभी ये सोचती हूँ, मै
बैठी होगी तुम, उसी कोने मे
करती.. मेरा इन्तजार
आँखें मेरी, बरबस ही भर जाती है
बतलाओ... तब मै क्या करूँ माँ?
जब देखती हूँ,
इन आंखों से तुम्हारी छवि,
तो मुस्कान खिल उठती है चुपके से,
हौसला तुम्हारा देख कर
मन को चैन मिलता है ..स्वर्ग सा|
आज भी रखती हो तुम, मेरा ख्याल
माँगा करती हो, भगवान् से
सब कुछ हमारे लिए...
अपनी झोली फैला|
निस्वार्थ प्यार की तुम, मिसाल
तुम मेरी माँ|
हर जनम, जनम लूँ
तेरी ममता की छाव मे,
माँगा करूँ सदा, मै ...माँ

19 जून 2008

दिलों की मजिल


मंजिल है...दिल तक पहुँचने की
इस राह मे,
ना जाने कितनी
हसरतें जागती है|
बिन पूछे मुझसे
मुझी को सताती हैं|
न कभी देखा,
ना कभी जाना जिसे,
ना ही महसूस किया कभी,
कहाँ से आकर जाने ?
दिल मे मेरे,
सुबह शाम मुझे जगाती है|
इस राह मे,
सुंदर सपनों की दुनिया है|
बादलों का छत,
और फूलों की जमीन है|
कभी इस पर भी,
काँटों का साथ मिलता है|
दिल रोता है... तब
जब, सपना कोई टूटता है
लेकिन मायूसी...ना
कभी भी इसकी हमसफ़र नही|
हिम्मत रहे बाकी
दिलों की मजिल अब दूर नही|

15 अप्रैल 2008

अच्छा होता है ....






कभी
किसी मोड़ पर मुड़ जाना ही
अच्छा होता है,
शायद, कदमों से तुम्हारे
आकर मिल जाएँ कदम किसी और के|

कभी किसी पल का रुक जाना ही
अच्छा होता है,
शायद, इंतजार मे तुम्हारे
कोई खींच रहा हो उस पल को पास अपने|

कभी किसी सपने का टूट जाना ही
अच्छा होता है,
शायद, सपनों की दुनिया से बाहर
दिखने लग जाएँ तुम्हें कोई सच्ची तस्वीर|

कभी किसी का हाथ थाम लेना ही
अच्छा होता है,
शायद उन्ही हाथों मे
लिखी गई हो तुम्हारी भी तक़दीर|

10 अप्रैल 2008

बरफ की फर्श पर


बरफ की फर्श पर......
कभी आवाजें होती हैं....
रुई के फाहों से, उड़ते ये
कभी इनसे भी झंकारें आती है....
किसी ने जैसे पैजनियाँ झंकायी
घुन्घुरुवों को, सफ़ेद फर्श पर बिखेरा
उसकी छम-से की आवाज़ मे
नाचती ये बरफ की नन्ही परियाँ|

बरफ की फर्श पर...
नींद भी चुपके से सोती है
करवटें लेती है, हौले से
आसमानी ये, नन्ही परियाँ
तब चमकती हैं, जुगनुओं सी
शरमाती है, उंगलियों की स्पर्श से
बरफ की नाजुक कलियाँ

सफ़ेद चादरों पर सोते है
नींद मे जागते हुए कुछ सपने ....
सूरज के किरणों के, बिखरते ही
चमकते हैं, ये सपने लेकर अंगडाई
बैठते हैं, बरफ की फर्श पर...
निकलती है , धूप की डोली मे,
तब सपनों की दुनियाँ|