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07 जुलाई 2008

सागर ....जीवन का


यूँ तो दिल करता है,
चुन लाऊं, कुछ ऐसी सीपी
जिसके सिने मे हो मोती|
पर, सागर की लहरों को देख कर
कभी कदम बढ़ते है,
कभी कदम, पीछे हट जाते है
दिल कभी उन लहरों को देख कर,
उसकी सफ़ेद फेनिल मे डूब जाता है|
कभी तरंगो की उचाईयां,
पलकों के बंद करने पर भी,
ख़ुद मे मुझे समां ले जाती है|
कैसे लाऊं? वो सीपी ....
जिसके सिने मे हो मोती|
डर अगर लगता है, सागर से
तो कैसे करे, प्यार जीवन से ?
सागर की लहरों के संग
लहराना होगा मुझे,
खोल कर, अपने दोनों हाँथ|
डूब जाना होगा, समुन्दर की गहराई मे
उस अंधेरे को चिर कर,
जाना होगा रौशनी की तरफ़|
उस सागर की गर्भ मे उतर कर,
वापस आना होगा, तरंगो के संग
बंद अपनी मुठ्ठी मे, वो सीपी ...
जिसके सिने मे हो मोती|

15 अप्रैल 2008

अच्छा होता है ....






कभी
किसी मोड़ पर मुड़ जाना ही
अच्छा होता है,
शायद, कदमों से तुम्हारे
आकर मिल जाएँ कदम किसी और के|

कभी किसी पल का रुक जाना ही
अच्छा होता है,
शायद, इंतजार मे तुम्हारे
कोई खींच रहा हो उस पल को पास अपने|

कभी किसी सपने का टूट जाना ही
अच्छा होता है,
शायद, सपनों की दुनिया से बाहर
दिखने लग जाएँ तुम्हें कोई सच्ची तस्वीर|

कभी किसी का हाथ थाम लेना ही
अच्छा होता है,
शायद उन्ही हाथों मे
लिखी गई हो तुम्हारी भी तक़दीर|