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06 अगस्त 2008

क्यों आठ पहर की चिंता तुझको?


क्यों आठ पहर की चिंता तुझको?
क्यों रे मन तू ना समझे?
पल की कुछ ख़बर नही,
हर दम सोचे कल की|

क्यों आठ पहर की चिंता तुझको?
खूब करे विनय निवेदन, मांगे मन भर मन्नते
जीवित प्राणी की कोई पूछ नही,
पत्थरों को खूब पूजे|

क्यों आठ पहर की चिंता तुझको?
देखे खुली आंखों से सपने,
रात-रात नींद आती नही,
जाग-जाग चिंतित मन जागे|

क्यों आठ पहर की चिंता तुझको?
धन-दौलत की चाह मे, उनत्ति की सीढियां चढ़े
मित्र ना बंधू, पास कोई भी नहीं
एकाकी जीवन काटे|

क्यों आठ पहर की चिंता तुझको?
क्यों रे मन तू ना समझे?

09 मई 2008

पहाड़


एक पहाड़,
एक चट्टान,
एक विरानगी,
क्या-क्या कहते है उसे|
अनगिनत नामों से उसे पुकारें|
वो जो रास्ते मे खड़ा है,
पत्थरों का ढ़ेर बना है|
सिने मे उसके,
दफन हैं, कई जख्म जैसे|
कभी पड़े खून के छीटें,
कभी चलीं तलवारें,
समय की मार उसे मिली,
मिली उसे, निगाहों की उदासी|
जेठ की धूप मे,
जरजर हुआ, उसका हर कोना
टूटता गया, हर हिस्सा
बह गया, भादों की पानी मे
सावन आए तो आये,
बाहर ना, उस पर आये
नन्हें पौधों को, तरसता रहे
रोम-रोम उसका,
धरती उसकी बंजर कहलाये|
सब सहते-सहते
बन गया वो 'एक पहाड़'|
जो हर मुश्किल सह जाए,
सीखें तो इससे कुछ सीखें,
अडिग, अचल, अभय है
नतमस्तक नही किसी के आगे|
लड़े एक वीर जैसे,
हर विपदा, हर बाधा से|
इतिहास से लेकर वर्तमान तक,
लड़ता आया वह, प्रतिकूलता से
चुप रह कर,
'पाषाण' शब्द यथार्थ करे
बंधे है, कदम उसके अपनी जड़ों से
छवि उसकी, हिम्मत जगाये
वीरता की गाथा सुनायें|