11 March 2009

भूलभुलैया राहें


भूलभुलैया राहें ये
भूलभुलैया
कभी पास बुलाए अपने
कभी दूर छिट्कादे
हरी भरी हरियाली इसमे
लबलबाते पानी के धारे
पास जाते जो मुरझाये
बन जाए काटें ही काटें
मन जो इससे मोहित होए
फिर हो ऐसे घायल
एक बार जो तीर लगे
घाव न भर पाये
एक बार जो चोट लगे
फिर न भ्रमित होना इससे
देख दूर से मन हर्षाये
पास जाकर चैन न खोवे
भूलभुलैया राहें ये
भूलभुलैया
'जिंदगी की राहों मे
एक राही तू
देख न भटकना राह अपनी
चलना मन को ठान अपनी'

23 January 2009

सोच बंदी है हमारी


ऐसा क्यों है
मै इतना कुछ महसूस करती हूँ
और कुछ भी नही बोल पाती हूँ
इतना कुछ सोचती हूँ
और जुबान खामोश रहते है
ऐसा क्यों है?

क्यों सबकी सुनती हूँ
कभी लगता है ये
सारी आवाजे मेरे भीतर फट जायेंगी
कंही मुझे बहरा तो बना देंगी
क्यों खामोशियों के साथ जीने की आदत सी हो गई है
ऐसा क्यों है?

कितना कुछ बोलना चाहती हूँ
लेकिन मन मसोश कर रह जाती हूँ
कितना कुछ बताना चाहती हूँ
लेकिन समझाऊ किसे
सारी सोच बताऊँ किसे
कौन मेरी समझेगा?
कौन मेरी सुनेगा?
ऐसा क्यों है?

जबाब मेरे पास भी नही
जबाब आपके पास भी नही होगा
हम सब ऐसे ही बन गए है
सिर्फ़ बोलना चाहते है आजादी के बोल
लेकिन मुह बंद है हमारे
समझाना और समझना चाहते हम
लेकिन सोच बंदी है हमारी

और हम सोचते है हम आजाद है
अगर ऐसा ही है,
तो मै पूछती हूँ सबसे
ऐसा क्यों है?

08 January 2009

चेहरा


चेहरे पर ना जाओ
हर चेहरा कुछ न कुछ बोलता है
कहीं मासूमियत
कहीं पर सुन्दरता
तो किसी पर मृदुल हसीं छलकती है
कभी कुछ छुपा ले
कभी कोई भी राज ना खोले
चेहरे पर ना जाओ
हर चेहरा कुछ न कुछ बोले
मन को ढापें ऐसे
जैसे खूब कोहरे से
सब कुछ छुप जाए
दिखे तो दिखे सब, जाने तो
लेकिन फिर भी ना जान पाये
चेहरे पर ना जाओ
हर चेहरा कुछ न कुछ बोले
कहते हैं, है मन का आईना
लेकिन जानो, आईना कभी भी सच्चाई नही है
देखो कभी ठग ले, दे कभी धोखे भी
ठोकर खाकर सम्भले तो ठीक
वरना राह मे कई और चेहरे मिल जायेंगे
चेहरे पर ना जाओ
हर चेहरा कुछ न कुछ बोले

31 December 2008

नव बर्ष की शुभकामनायें


कुछ आंसू की बूंदें
कुछ खुशी की लहर
आंसू मे भी वोही चमक
जो छिपी खुशी मे हमारे
फिर कांहें चिंता दुःख की
क्यों व्यथा से घबराएं
फिर कांहें स्वार्थ सताए
क्यों सब बटोरने की सोचे
कर कुछ भला बन्दे
दे दुनिया को कुछ तोहफे
याद करे दुनिया तुझे
जब भी नाम तेरा आए
दाता को है सब की ख़बर
दाता को है सबकी फिकर
इतना ही कहे हम
जोड़ कर दोनों हाथ
....हम चले नेक रस्ते पर
हम से भूल कर भी कोई भूल हो ना......

19 December 2008

वो बच्चे


खेतों खलिहानों मे दौड़ते वो बच्चे
मिट्टी से सने पानी मे खेलते वो बच्चे
पसीने से तर है उनके बदन
बिन कपडों के नंगे है उनके बदन
भूख से बिलबिलाते वो बच्चे
धुप मे काले हो गए उनके चेहरे
भूख से कभी पीले पड़ गए वो चेहरे
माता पिता को कड़ी मेहनत करते देख रहे वो बच्चे
फिर कैसे उनसे रोटी मांगे वो बच्चे
खेल मे तल्लीन रहने का करते है बहाना
भगवान् से बस प्रार्थना करते है वो बच्चे
कब अच्छे दिन आयेंगे? जब पेट भर वो भी खा पायेंगे
किसान जो लाखों का पेट भरता है
जो हमें सक्षम सबल बनता है
कितनी विडम्बना है उसकी
भूख से बिलबिला रहे है उसीके बच्चे
दो जून की रोटी के लिए रो रहे है
उसे फटे चिथडों को पहनाना पड़ता है
पाठशाला का कभी मुंह नही देखे, वो बच्चे
हाय रे ! और उन्हें ही देश का भविष्य बनाना है
कैसे भविष्य बनायेंगे वो बच्चे ?
जो ख़ुद इतनी जर्जर अवस्था मे है वो बच्चे

17 December 2008


एक छन आशा
एक छन निराशा
एक मन उगे
एक मन डूबे
आशा ...निराशा एक आये एक जाये

आशा ...निराशा
साथ जैसे शरीर और आत्मा
जैसे दिया बाती
या कोई प्यारी सहेली

मचाये हलचल
करे मन को व्याकुल
पल पल, हरपल

एक खुशी की लहर
एक दुःख की बदली
एक तड़प जगाये
एक जीवन जोत जलाए
आशा...निराशा एक आये एक जाये

आशा....निराशा
साथ जैसे नदी और धारा
जैसे धुप और छाँव
या किसी कड़वाहट मे छुपी मिठास

नैन भिगोये कभी
कभी राह सुझाए नयी
भूले भटके राही को
यही आशा..निराशा|
आशा...निराशा एक आये एक जाये|

29 October 2008

कलम






कलम लिखती है कभी कागज़ पर.... कभी दिल पर......

जब लिख ना पाये अपनी अक्षर तब बोलती है कभी जुबान से.... कभी निगाह से.....

कलम चलती है कभी सोच थम जाती है कभी शब्द अटक जाते है

विचारों का मंथन होता है कभी दिमाग में.... कभी मन में ....

हाथ बार-बार कलम के साथ बढ़ते है, कोरे कागज़ की ओर चलते है, रुक जाते है

चुनकर एक शब्द, फिर चल पड़ते है कलम दौड़ती है कागज़ पर.....

खाली पन्नों को आकार देती है अपनी सोच की छवि का

सजाती है, सवारती है स्याह रंगों से, श्यामल रूप

कलम बोलती है कागज़ पर...

जहाँ गुम हुए कुछ शब्द रगड़ती जाती है, एक ही लकीर को

कभी छेद हुए जो पन्नो पर कुछ सपने वहाँ से बह जाते है...

लेकिन कागज़ के टुकडों पर कलम शब्द जोड़ती है

शसक्त करती अपनी आवाज बोलती अपनी बोली

कलम लिखती है कागज़ पर...दिल पर.....

कभी कुछ अनसुलझे पहलू पर जब कलम सोचती जाती है

फेकतें है, फाड़ कर उन पन्नों को

मुडे-मुडे से, कुचटे हुए से सभी शब्द पन्नों से झांकते है

बड़ी बेबस सी तब कलम नजर आती है

कभी किसी बेबसी की कहानी

कभी किसी दिल की जुबानी लिखने, फिर से चल पड़ती है

कलम...चलती है लिखती है कागज़ पर...दिल पर