18 जनवरी 2010

कभी कभी


कुछ राहों पर चलते चलते,
कुछ राहें मिल जाती हैं|
कभी यु ही देखते देखते,
आसमान मे बादल छा जाते हैं|
ऐसा भी हुआ है, कई बार
दिशाहीन होकर नई दिशा मिल जाती है|
कभी अकेले कदम बढाते बढ़ाते,
हमकदम भी मिल जाते है|
कितनी बातें अनहोनी सी लगाती है
लेकिन कभी कभी वो भी हो जाती है|
सोच की धारा मे बहते बहते,
सोच के आधार बदल जाते है|
बस सच है तो इतना , हर पल कुछ होता है
हर दम कुछ कंहीं बदलता रहता है|
यु भी तो होता है कभी कभी,
जो न सोचा था वो बात भी बन जाती है|
जिंदगी कितने रंग लेकर आती है,
कभी कभी रंगहीन पटल पर, कई रंग बिखेर जाती है|

4 टिप्‍पणियां:

अनिल कान्त : ने कहा…

सही लिखा है आपने

sanjeev ने कहा…

jivan ke prati ye sakaaraatmak soch aur har mushkil se raah bana lene ki ummed wakai....padhne ke baad naya josh bhar diya aapki in panktiyon ne.

अजय कुमार ने कहा…

जिंदगी कितने रंग लेकर आती है,
कभी कभी रंगहीन पटल पर, कई रंग बिखेर जाती है|

बहुत खूब , सुंदर रचना

मेनका ने कहा…

aap sabhi ka bahut bahut dhanyabaad