17 December 2008


एक छन आशा
एक छन निराशा
एक मन उगे
एक मन डूबे
आशा ...निराशा एक आये एक जाये

आशा ...निराशा
साथ जैसे शरीर और आत्मा
जैसे दिया बाती
या कोई प्यारी सहेली

मचाये हलचल
करे मन को व्याकुल
पल पल, हरपल

एक खुशी की लहर
एक दुःख की बदली
एक तड़प जगाये
एक जीवन जोत जलाए
आशा...निराशा एक आये एक जाये

आशा....निराशा
साथ जैसे नदी और धारा
जैसे धुप और छाँव
या किसी कड़वाहट मे छुपी मिठास

नैन भिगोये कभी
कभी राह सुझाए नयी
भूले भटके राही को
यही आशा..निराशा|
आशा...निराशा एक आये एक जाये|

5 टिप्पणियाँ:

सुनील मंथन शर्मा ने कहा…

आशा...निराशा एक आये एक जाये|
और जीवन जगाये.

creativekona ने कहा…

Menakaji,
Asha aur nirasha ..ye hee to jeevan hai .Jisne jeevan ke is tatva ko samajh liya samajho uska jeevan safal hua.Apne komal,pravahmaya shbdon evam bhasha men jeevan ke is sar ko likha....Badhai.
Hemant Kumar

dr. ashok priyaranjan ने कहा…

अनुभूित का बहुत संवेदनशील शािब्दक िचत्रांकन िकया है आपने । बधाई । बहुत अच्छी रचना है-भाव और िवचार दोनो दृिष्ट से । मैने अपने ब्लाग पर एक लेख िलखा है-आत्मिवश्वास के सहारे जीतें िजंदगी की जंग-समय हो तो पढें और राय भी दें ।


http://www.ashokvichar.blogspot.com

dr. ashok priyaranjan ने कहा…

अनुभूित का बहुत संवेदनशील शािब्दक िचत्रांकन िकया है आपने । बधाई । बहुत अच्छी रचना है-भाव और िवचार दोनो दृिष्ट से । मैने अपने ब्लाग पर एक लेख िलखा है-आत्मिवश्वास के सहारे जीतें िजंदगी की जंग-समय हो तो पढें और राय भी दें ।


http://www.ashokvichar.blogspot.com

मेनका ने कहा…

Aap sabhi ka bahut bahut dhanyabaad.